विवाहित महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और मिथिला क्षेत्र में इस व्रत को लेकर विशेष श्रद्धा देखने को मिलती है। इस वर्ष वट सावित्री व्रत शनिवार, 16 मई 2026 को मनाया जा रहा है।
मान्यता है कि इस दिन बरगद के वृक्ष की पूजा और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है और परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
वट सावित्री व्रत का महत्व
हिंदू धर्म में वट वृक्ष को त्रिदेवों का प्रतीक माना गया है। कहा जाता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। इसी कारण सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा कर उसके चारों ओर कच्चा सूत बांधती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और अटूट प्रेम से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
बरगद की परिक्रमा के समय बोलें ये शक्तिशाली मंत्र
वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय इन मंत्रों का जाप शुभ माना जाता है:
1. मुख्य परिक्रमा मंत्र
“ॐ नमः शिवाय वटवृक्षाय मम सौभाग्यं देहि देहि स्वाहा।”
मान्यता है कि इस मंत्र के जाप से वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता बनी रहती है।
2. अखंड सौभाग्य मंत्र
“वटाय नमः। सावित्र्यै नमः। सत्यवानाय नमः।”
यह मंत्र पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास और लंबी आयु का प्रतीक माना जाता है।
3. सुख-समृद्धि मंत्र
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”
महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी इस दिन बेहद शुभ माना जाता है।
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि
सुबह जल्दी स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा की थाली में रखें:
- रोली
- अक्षत
- कच्चा सूत
- फल
- भीगे हुए काले चने
- दीपक
- जल का लोटा
- मिठाई
फिर बरगद के पेड़ के पास जाकर जल अर्पित करें और कच्चे सूत को पेड़ के चारों ओर लपेटते हुए 7 बार परिक्रमा करें। परिक्रमा के दौरान माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें।
क्यों खास है वट वृक्ष?
धार्मिक दृष्टि से बरगद का पेड़ दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें लगातार फैलती रहती हैं, इसलिए इसे अनंत जीवन और परिवार की मजबूती से जोड़ा जाता है।
बिहार और मिथिला में कई स्थानों पर महिलाएं समूह में वट सावित्री पूजा करती हैं और लोकगीत भी गाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्वी और बुद्धिमान थीं। उन्होंने सत्यवान को अपना पति चुना, जबकि देवर्षि नारद ने पहले ही बता दिया था कि सत्यवान अल्पायु हैं।
विवाह के बाद जिस दिन सत्यवान की मृत्यु का समय आया, उस दिन सावित्री भी उनके साथ जंगल गईं। सत्यवान अचानक बेहोश होकर गिर पड़े और यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे। तब सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं।
सावित्री की बुद्धिमानी, पतिव्रता धर्म और दृढ़ निश्चय से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांंगने को कहा। सावित्री ने पहले सास-ससुर की आंखों की रोशनी, फिर उनका खोया राज्य और अंत में सौ पुत्रों का वरदान मांगा। यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन सौ पुत्र होने के लिए सत्यवान का जीवित होना जरूरी था। तब यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।
वट सावित्री व्रत करने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से:
- पति की आयु लंबी होती है
- वैवाहिक जीवन में सुख बना रहता है
- परिवार में समृद्धि आती है
- मानसिक शांति मिलती है
- संतान सुख की प्राप्ति होती है
- नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
पूजा में काले चने क्यों चढ़ाए जाते हैं?
वट सावित्री पूजा में काले चने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जब यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दिया, तब उससे जुड़ी प्रतीकात्मक परंपरा के रूप में काले चने चढ़ाने की शुरुआत हुई। कई स्थानों पर इसे शनि और यम देव से भी जोड़कर देखा जाता है।
बिहार में क्यों खास है यह पर्व?
बिहार, मिथिला और पूर्वांचल में वट सावित्री व्रत को बड़े श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। गांवों में महिलाएं पारंपरिक साड़ी पहनकर समूह में पूजा करती हैं और लोकगीत गाती हैं। कई जगहों पर बरगद के पेड़ के नीचे मेले जैसा माहौल भी देखने को मिलता है।
निष्कर्ष
वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति में प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और व्रत से दांपत्य जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य बना रहता है। इस दिन बरगद की परिक्रमा करते समय मंत्र जाप और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनना विशेष फलदायी माना गया है।